– न्यायाधीश अशोक चौधरी का आदेश: पत्नी को 20 हजार और बेटी को 10 हजार रुपये भरण-पोषण दे पति; 24 मई 2024 से लागू होगा फैसला
– ससुर ने किया था खेल: बहू के नाम लोन लेकर नहीं भरी किश्त, बैंक ने कुर्क किया मकान; पुलिस ने मां-बेटी को घर से निकाला तो सड़क पर आ गई थीं
बीकानेर, 6 फरवरी (शुक्रवार)। बीकानेर के पारिवारिक न्यायालय (Family Court) ने एक अहम फैसले में पत्नी और नाबालिग बेटी के अधिकारों की रक्षा की है। न्यायाधीश अशोक चौधरी ने पति की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने खुद को कम आय वाला बताया था।
कोर्ट ने पति जगदीश सोनी को आदेश दिया है कि वह अपनी पत्नी सरोज सोनी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए कुल 30,000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान करे। इसमें पत्नी के लिए 20 हजार और बेटी के लिए 10 हजार रुपये तय किए गए हैं। यह आदेश 24 मई 2024 से प्रभावी माना जाएगा, यानी पति को पिछले एरियर का भी भुगतान करना होगा।
"धोखे से लोन लिया, फिर घर से निकाल दिया"
पत्नी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अनिल सोनी ने कोर्ट के सामने पीड़िता का दर्दनाक पक्ष रखा। सरोज की शादी 18 साल पहले हुई थी। आरोप है कि पति शराब पीकर मारपीट करता था और 'बुलेट मोटरसाइकिल' की मांग करता था। सरोज के ससुर ने धोखे से उसके नाम पर बैंक लोन लिया, लेकिन किश्तें नहीं चुकाईं। नतीजा यह हुआ कि बैंक ने मकान कुर्क कर लिया। पुलिस की मदद से सरोज और उसकी बेटी को घर से बेदखल कर दिया गया। उसका सामान भी मकान में रह गया और वे सड़क किनारे रहने को मजबूर हो गईं।
पति बोला- मैं 9 हजार कमाता हूं, कोर्ट ने नहीं माना
सुनवाई के दौरान पति जगदीश सोनी ने भरण-पोषण से बचने के लिए तर्क दिए: उसने कहा कि वह एक सिक्योरिटी गार्ड है और सिर्फ 9,000 रुपये महीना कमाता है। वहीं, पत्नी 50,000 रुपये कमाती है। न्यायाधीश ने माना कि पति ने पत्नी की आय का कोई सबूत पेश नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि महंगाई के दौर में पत्नी और बेटी का भरण-पोषण पति की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है। पति सक्षम है, लेकिन जानबूझकर देखभाल नहीं कर रहा।

0 Comments