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राजस्थान में पहली बार: बीकानेर पीबीएम में अब मरीज के खुद के खून से होगा हड्डियों का इलाज; बिना ऑपरेशन ठीक होंगे घुटने और कंधे

India-1stNews



​– प्रदेश की पहली लैब: पीबीएम के ट्रोमा सेंटर में 'ऑर्थो बायोलॉजिकल रिजनरेटिव केयर' की शुरुआत; डॉ. खजोटिया और डॉ. कपूर ने दी जानकारी

– बड़ी राहत: बिना चीर-फाड़ और बिना स्टेरॉयड के 1 घंटे में होगा इलाज; स्पोर्ट्स इंजरी और आर्थराइटिस में मिलेगी नई जिंदगी

​बीकानेर, 6 जनवरी (मंगलवार)।बीकानेर के पीबीएम अस्पताल (PBM Hospital) ने चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। अस्पताल से संबद्ध ट्रोमा सेंटर में प्रदेश की पहली अत्याधुनिक 'ऑर्थो बायोलॉजिकल रिजनरेटिव केयर' (OBRC) लैब का ट्रायल मंगलवार से शुरू होने जा रहा है।

​ट्रोमा हॉस्पिटल प्रभारी और वरिष्ठ अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. बी.एल. खजोटिया ने बताया कि यह लैब हड्डी एवं मस्क्यूलोस्केलेटल बीमारियों के उपचार में मील का पत्थर साबित होगी।

​क्या है OBRC तकनीक? (मरीज के खून से ही बनेगा टीका)

​डॉ. खजोटिया ने बताया कि यह एक आधुनिक उपचार पद्धति है।

  • ​प्रक्रिया: इसमें मरीज के स्वयं के रक्त (Blood) और बोन मैरो से प्राप्त ब्लड कंपोनेंट्स को संकेंद्रित (Concentrate) किया जाता है।
  • ​टीका: मरीज के खून से ही उपचार का टीका (Injection) तैयार किया जाता है, जिसे प्रभावित जगह पर लगाया जाता है।
  • ​फायदा: इससे शरीर में प्राकृतिक रूप से हीलिंग और टिशू रिपेयर (Tissue Repair) को बढ़ावा मिलता है।

​बिना चीर-फाड़ के इलाज: 1 घंटे में छुट्टी

​वरिष्ठ अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय कपूर ने बताया कि यह एक 'मिनिमम इनवेसिव' (Minimally Invasive) तकनीक है।

  • ​नो ऑपरेशन: इसमें किसी भी तरह के ऑपरेशन या चीर-फाड़ की जरूरत नहीं पड़ती।
  • ​नो केमिकल: इसमें बाहरी रसायनों (जैसे स्टेरॉयड) का इस्तेमाल नहीं होता।
  • ​डे-केयर: यह ओपीडी आधारित प्रक्रिया है। मरीज इलाज लेकर लगभग 1 घंटे में अपने घर जा सकता है।

​इन बीमारियों में मिलेगा रामबाण इलाज

​इस नई तकनीक का उपयोग विशेष रूप से स्पोर्ट्स इंजरी और पुराने दर्दों में किया जाएगा:

  • ​कंधा: रोटेटर कफ, फ्रोजन शोल्डर।
  • ​कोहनी: टेनिस एल्बो, गोल्फर एल्बो।
  • ​घुटना: आर्थराइटिस (ग्रेड 1, 2, 3), कार्टिलेज, मेनिस्कस इंजरी।
  • ​अन्य: एंकल पेन, प्लांटर फेशियाइटिस, हड्डियों का जुड़ना (Non-union), डिस्क प्रोलैप्स।

​10 साल की रिसर्च और भामाशाह का सहयोग

​यह पद्धति पिछले 10 वर्षों से रेजिडेंट डॉक्टर्स द्वारा उनकी थीसिस के अंतर्गत प्रयोग की जा रही थी, जिसके परिणाम बेहद उत्कृष्ट रहे हैं। इसे क्लिनिकल रिसर्च कमेटी से भी मंजूरी मिल चुकी है।

  • ​सहयोग: लैब की स्थापना में नोखा के भामाशाह मघाराम कुलरिया ने आर्थिक सहयोग दिया है। भविष्य में यहां 'ऑर्थोपेडिक मेडिकल रिसर्च सेंटर' भी बनाया जाएगा।

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