— बीडीए (BDA) की कार्यप्रणाली फिर सवालों में: जनता प्याऊ के पास विवादित भूखंड पर पूर्ण ध्वस्तीकरण के बजाय केवल लोहे के शटर हटाकर लौटी टीम; पीड़ित पक्ष ने लगाए आंशिक कार्रवाई के आरोप।
— मंत्री के बीकानेर दौरे पर खुली थी फाइल: 'प्रशासन शहरों के संग अभियान' में तथ्यों को छुपाकर जारी करवाया गया था पट्टा; प्रमुख शासन सचिव की जांच के बाद मार्च 2025 में ही निरस्त हो चुका है पट्टा।
— धोखाधड़ी पर क्यों साधी चुप्पी?: पट्टा निरस्त होने के सवा साल बाद भी न तो दोषी कार्मिकों पर विभागीय गाज गिरी और न ही पट्टाधारी के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर; उठ रहे गंभीर सवाल।
बीकानेर, 24 जून (बुधवार)। बीकानेर संभाग में अवैध निर्माणों और नियमों को ताक पर रखकर पट्टे जारी करने के मामलों को लेकर बीकानेर विकास प्राधिकरण (BDA) एक बार फिर गंभीर विवादों और सवालों के घेरे में आ गया है। शहर के व्यस्ततम जनता प्याऊ के पास स्थित एक बेशकीमती विवादित भूखंड के मामले में सूबे के नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन (UDH) कैबिनेट मंत्री झाबर सिंह खर्रा के कड़े संज्ञान के बाद बीडीए का दस्ता मौके पर तो पहुंचा, लेकिन शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार टीम ने महज औपचारिकता निभाते हुए केवल आंशिक कार्रवाई की और पक्के अवैध निर्माण को छुए बिना ही वापस लौट गई।
सवा साल पुराने इस हाई-प्रोफाइल मामले में बीडीए की इस लचर कार्यशैली को लेकर अब प्रशासनिक और राजनीतिक हल्कों में नए सिरे से चर्चाएं गर्म हो गई हैं।
तथ्य छुपाकर जारी हुआ था पट्टा; प्रमुख शासन सचिव की जांच में हुआ था खुलासा
पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि के अनुसार, यह विवाद साल 2023 में आयोजित 'प्रशासन शहरों के संग अभियान' के दौरान शुरू हुआ था:
- फर्जीवाड़े का आरोप: शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, मदन गोपाल पंवार नामक व्यक्ति ने अपने स्वर्गीय पिता शंकर लाल पंवार के नाम की संपत्ति से जुड़े कई महत्वपूर्ण और विधिक तथ्यों को छुपाकर तत्कालीन नगर विकास न्यास (UIT) के समक्ष पट्टे के लिए आवेदन किया था।
- आपत्तियों को किया दरकिनार: इस भूखंड को लेकर बकायदा लिखित आपत्तियां दर्ज करवाई गई थीं, लेकिन तत्कालीन यूआईटी अधिकारियों ने गहरी मिलीभगत के चलते तमाम आपत्तियों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और 19 जून 2023 को विवादित पट्टा जारी कर दिया।
- धारा 60-सी के तहत एक्शन: मामला जब जयपुर में नगरीय विकास विभाग के प्रमुख शासन सचिव के दफ्तर पहुंचा, तो उच्च स्तरीय विधिक जांच बिठाई गई। जांच में गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं उजागर होने के बाद बीकानेर विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने राजस्थान नगर सुधार अधिनियम, 1959 की धारा 60-सी के तहत कार्रवाई करते हुए 21 मार्च 2025 को उक्त पट्टे को पूरी तरह निरस्त (कैंसिल) कर दिया था।
कैबिनेट मंत्री झाबर सिंह खर्रा के बीकानेर आते ही अधिकारियों के फूले हाथ-पांव
पट्टा निरस्त होने के बावजूद सवा साल तक बीडीए के अधिकारी इस फाइल को दबाकर बैठे रहे और मौके पर काबिज अवैध निर्माण के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। हाल ही में जब यूडीएच मंत्री श्री झाबर सिंह खर्रा बीकानेर के आधिकारिक दौरे पर आए, तो पीड़ित पक्ष ने उनसे मुलाकात कर बीडीए अधिकारियों की इस कथित मिलीभगत और लापरवाही का पूरा कच्चा चिट्ठा उनके सामने रख दिया।
मंत्री खर्रा के कड़े तेवर और सख्त नाराजगी के बाद बीडीए महकमे में हड़कंप मच गया। आनंद-फानन में बीडीए का प्रवर्तन दस्ता क्रेन और जाब्ते के साथ जनता प्याऊ के पास मौके पर पहुंचा। लेकिन वहां जो कार्रवाई हुई, उसने बीडीए की मंशा पर और बड़े सवाल खड़े कर दिए। दस्ते ने वहां खड़े पक्के और स्थायी अवैध निर्माण (दुकानों) को ढहाने के स्थान पर केवल दुकानों के आगे लगे लोहे के शटर हटाए और सीलिंग की रस्म अदायगी कर वापस लौट आया।
शिकायतकर्ता पक्ष के बीडीए से 3 तीखे सवाल:
बीडीए की इस आंशिक कार्रवाई से असंतुष्ट शिकायतकर्ता पक्ष ने प्राधिकरण की नीयत पर सवाल उठाते हुए तीन बेहद गंभीर विधिक प्रश्न खड़े किए हैं:
- कार्मिकों पर मेहरबानी क्यों?: जब बीकानेर विकास प्राधिकरण स्वयं अपनी उच्च स्तरीय जांच में यह मान चुका है कि पट्टा गलत जारी हुआ था, तो फर्जी प्रक्रिया से जुड़े तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों और बाबूओं के विरुद्ध अब तक कोई विभागीय या अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
- एफआईआर दर्ज क्यों नहीं?: तथ्यों को छुपाकर राजकार्य में धोखाधड़ी करने और फर्जी दस्तावेज पेश करने वाले पट्टाधारी के खिलाफ बीडीए प्रशासन ने अभी तक स्थानीय थाने में नामजद प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं करवाई?
- पीला पंजा चलाने से क्यों हिचकिचाई टीम?: जब पट्टे का विधिक अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है और वह भूमि पुनः सरकारी रिकॉर्ड में आ चुकी है, तो फिर उस पर बने पक्के अवैध निर्माण को पूरी तरह जमींदोज करने की जगह केवल शटर हटाने तक ही कार्रवाई को सीमित क्यों रखा गया?
इस पूरे मामले में यूडीएच मंत्री के आदेशों के बाद भी बीडीए की यह सुस्त और रक्षात्मक कार्यशैली यह साफ संकेत देती है कि दाल में कुछ काला जरूर है। अब देखना यह होगा कि मंत्री झाबर सिंह खर्रा के जयपुर लौटने के बाद बीडीए इस अवैध निर्माण पर पूर्ण ध्वस्तीकरण का पीला पंजा चलाता है या रसूखदारों के आगे इसी तरह आंशिक कार्रवाई का खेल चलता रहेगा।

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