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सुप्रीम कोर्ट का 'ब्रेकिंग' आदेश: UGC के नए भेदभाव-विरोधी नियमों पर लगी रोक; CJI बोले- 'इनका हथियार की तरह इस्तेमाल हो सकता है', 19 मार्च को अगली सुनवाई

India-1stNews



​– बड़ी राहत: जनरल कैटेगरी के छात्रों की दलील सुनी; कोर्ट ने माना- नियम अस्पष्ट हैं और एकतरफा हैं, रैगिंग और जातिवाद में फर्क करना मुश्किल होगा

– केंद्र और UGC को नोटिस: सुप्रीम कोर्ट ने ड्राफ्ट फिर से तैयार करने को कहा; झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान हटाने पर भी उठे सवाल

​नई दिल्ली/बीकानेर, 29 जनवरी (गुरुवार)।सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026' पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।

​चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इन नियमों के प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका "गलत इस्तेमाल" (Weaponization) हो सकता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया है।

​CJI ने कोर्ट रूम में क्या कहा?

​सुनवाई के दौरान CJI ने कई तार्किक सवाल उठाए, जो नए नियमों की खामियों को उजागर करते हैं:

  1. कोर्ट ने कहा, "हम केवल संवैधानिकता की जांच कर रहे हैं। मान लीजिए कोई आरक्षित वर्ग का छात्र दूसरे समुदाय के छात्र के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करता है, तो क्या इसका कोई उपाय है?"
  2. ​बेंच ने पूछा कि रैगिंग और जातिगत भेदभाव में अंतर कैसे करेंगे? अगर कोई नया छात्र (चाहे सवर्ण हो) रैगिंग का विरोध करता है, तो उस पर जातिगत भेदभाव का क्रॉस-केस चलाया जा सकता है। उसे कॉलेज के पहले महीने में ही जेल जाना पड़ सकता है।
  3. ​एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि नियम 3(C) मानता है कि केवल एक खास वर्ग ही पीड़ित हो सकता है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्र भी भेदभाव का शिकार हो सकते हैं।

​क्यों हो रहा था इन नियमों का विरोध?

​UGC ने 13 जनवरी को ये नियम नोटिफाई किए थे, जिसका देशभर में (खासकर जनरल कैटेगरी के छात्रों द्वारा) विरोध हो रहा था। विरोध की मुख्य वजहें थीं:

  • ​आरोप था कि नए नियमों में सवर्ण छात्रों को पहले से ही 'दोषी' मान लिया गया है। वे केवल आरोपी हो सकते हैं, पीड़ित नहीं।
  • ​नए नियमों में झूठी शिकायत करने वाले पर सजा या जुर्माने का प्रावधान हटा दिया गया था। इससे डर था कि आपसी रंजिश में किसी का करियर बर्बाद किया जा सकता है।
  • ​शिकायतों की सुनवाई करने वाली 'इक्वलिटी कमेटी' में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात स्पष्ट नहीं थी।

​अब आगे क्या?

फिलहाल कॉलेजों में ये नए नियम लागू नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी कमेटी बनाने का सुझाव दिया है जिसमें सामाजिक मूल्यों को समझने वाले एक्सपर्ट्स हों। मामले की अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी।

क्यों बने थे नियम?

​रोहित वेमुला (2016) और पायल तडवी (2019) की आत्महत्या के बाद उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए सख्त नियमों की मांग उठी थी। इसी के तहत UGC ने SC, ST और OBC छात्रों के संरक्षण के लिए ये नियम बनाए थे, लेकिन इनके ड्राफ्टिंग पर सवाल खड़े हो गए।


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