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बीकानेर उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला: 25 लाख के बीमा क्लेम मामले में स्टार हेल्थ इंश्योरेंस को दिए आदेश; 2 माह में निस्तारण के निर्देश

India-1stNews



– उपभोक्ता हित सर्वोपरि: परिवाद को 'प्री-मैच्योर' मानने के बावजूद आयोग ने परिवादिनी को दिया न्यायसंगत अवसर; तकनीकी आधार पर नहीं रुकेगा हक।

– आदेश की सख्ती: बीमा कंपनी को क्लेम आवेदन प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर विधि अनुसार करना होगा निस्तारण।

– अधिवक्ता की प्रभावी पैरवी: अधिवक्ता सुनीता अरोड़ा ने आयोग के समक्ष रखे सशक्त तथ्य; उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका।

बीकानेर, 13 अप्रैल (सोमवार)। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बीकानेर ने बीमा क्लेम से जुड़े एक परिवाद (136/2023) में बड़ा आदेश जारी किया है। यह मामला बैंक ऑफ बड़ौदा (श्रीडूंगरगढ़) और स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी से जुड़ा है, जहाँ एक विधवा महिला अपने पति के आकस्मिक निधन के बाद बीमा राशि के लिए संघर्ष कर रही है।

क्या था मामला?

​परिवादिनी श्रीमती संतोष कंवर (निवासी बीकानेर) के पति स्वर्गीय लिछमण सिंह पंवार ने 25 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी ली थी। 4 मई 2021 को उनके आकस्मिक निधन के बाद संतोष कंवर ने बीमा कंपनी से क्लेम की मांग की थी। विपक्षी बैंक और बीमा कंपनी द्वारा क्लेम में आनाकानी करने पर मामला उपभोक्ता आयोग पहुँचा।

आयोग का रुख: 'प्री-मैच्योर' लेकिन न्यायसंगत

​आयोग ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद पाया कि परिवादिनी द्वारा कंपनी के समक्ष विधिवत क्लेम प्रस्तुत करने के पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं थे, जिसके कारण तकनीकी रूप से परिवाद को 'प्री-मैच्योर' माना गया। हालांकि, आयोग ने इसे खारिज करने के बजाय उपभोक्ता के हित में रास्ता निकाला।

समयबद्ध निस्तारण के निर्देश

​आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए हैं:

  • परिवादिनी के लिए: आदेश की तिथि से 2 माह के भीतर आवश्यक दस्तावेजों के साथ बीमा कंपनी को क्लेम आवेदन दें।
  • बीमा कंपनी के लिए: आवेदन प्राप्त होने के 2 माह के भीतर अनिवार्य रूप से क्लेम का निस्तारण करें।
  • स्वतंत्रता: यदि कंपनी निर्धारित समय में निर्णय नहीं लेती या परिवादिनी संतुष्ट नहीं होती, तो वह पुनः आयोग के समक्ष नया परिवाद पेश कर सकेंगी।

अधिवक्ता सुनीता अरोड़ा की सराहना

​प्रकरण में परिवादिनी की ओर से अधिवक्ता सुनीता अरोड़ा ने प्रभावी और सशक्त पैरवी की। उन्होंने विधिक पहलुओं और मानवीय संवेदनाओं को आयोग के समक्ष इतने स्पष्ट रूप से रखा कि परिवादिनी को राहत का अवसर प्राप्त हुआ। कानूनी हलकों में उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के लिए उनकी इस पैरवी की सराहना की जा रही है।

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