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बीकानेर: नसबंदी के 2 साल बाद हुई पांचवीं संतान; महिला ने अस्पताल पर लगाया लापरवाही और दबाव का आरोप, कोर्ट ने कहा— 'सरकार करे मदद'

India-1stNews



​– नसबंदी फेल: 4 बच्चों के बाद महिला ने कराया था ऑपरेशन; 2 साल बाद गर्भवती होने पर झेलनी पड़ी सामाजिक बदनामी।

– गंभीर आरोप: महिला का दावा— "निजी अस्पताल ने जुड़वा बच्चे बताकर सफाई (Abortion) का बनाया दबाव, सरकारी जांच में निकला एक ही बच्चा।"

– कानूनी लड़ाई: कोर्ट ने डॉक्टरों को दोषी नहीं माना, लेकिन राज्य सरकार को पॉलिसी के तहत हर्जाना देने के दिए निर्देश।

​बीकानेर, 19 मार्च (गुरुवार)।बीकानेर की एक महिला के लिए परिवार नियोजन का फैसला उस समय मानसिक और आर्थिक बोझ बन गया, जब उसकी नसबंदी फेल हो गई। 4 बच्चों की मां ने आर्थिक तंगी के कारण नसबंदी कराई थी, लेकिन कुदरत और सिस्टम की खामी ने उसे पांचवीं संतान को जन्म देने पर मजबूर कर दिया।

​मजदूरी और तंगी के बीच 'नसबंदी फेल' का झटका

​पीड़ित महिला के पति दिव्यांग हैं और परिवार मजदूरी पर निर्भर है। 1 जुलाई 2015 को चौथे बच्चे के बाद महिला ने नसबंदी कराई थी। करीब दो साल बाद 2017 में जब वह दोबारा गर्भवती हुई, तो उसे पड़ोसियों के तानों और भारी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा।

​निजी बनाम सरकारी अस्पताल की जांच

​महिला का आरोप है कि जब वह चेकअप के लिए संबंधित अस्पताल पहुँची, तो डॉक्टरों ने पहले तो नसबंदी फेल होने से इनकार किया। बाद में टेस्ट में प्रेग्नेंसी की पुष्टि हुई।

निजी अस्पताल का दावा: सोनोग्राफी में जुड़वा बच्चे बताए गए और कहा गया कि एक बच्चा संक्रमित है, जिससे मां की जान को खतरा है। सफाई कराने के लिए दबाव बनाया गया।​

पीबीएम अस्पताल की रिपोर्ट: महिला ने सरकारी पीबीएम अस्पताल में जांच कराई, जहाँ पता चला कि गर्भ में एक ही बच्चा है और वह पूरी तरह स्वस्थ है। महिला ने बच्चे को जन्म देने का फैसला किया और 18 अक्टूबर 2017 को पांचवीं संतान को जन्म दिया।

​कोर्ट का फैसला: लापरवाही नहीं, पर सहायता जरूरी

​सीनियर एडवोकेट अनिल सोनी के माध्यम से महिला ने कोर्ट में हर्जाने के लिए परिवाद पेश किया। महिला ने प्रसव खर्च, बच्चे के बालिग होने तक का खर्च और मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में लाखों रुपयों की मांग की थी।

​अस्पताल की दलील: कोर्ट में अस्पताल ने कहा कि नसबंदी 100% सफल होने की गारंटी नहीं होती और महिला को इसके फेल होने की संभावना के बारे में पहले ही बता दिया गया था।

​अंतिम निर्णय: कोर्ट ने माना कि फैलो रिंग का लूज होना या नसबंदी फेल होना सीधे तौर पर डॉक्टरों की लापरवाही सिद्ध नहीं करता। हालांकि, कोर्ट ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा कि परिवादी अनपढ़ और गरीब है, इसलिए राज्य सरकार अपनी पॉलिसी या बीमा कंपनी के माध्यम से महिला को सहायता राशि प्रदान करे।

​आगे की राह

​सीनियर एडवोकेट अनिल सोनी ने बताया कि वे कोर्ट के निर्देशानुसार सरकार और स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखेंगे ताकि पीड़िता को क्लेम राशि मिल सके। वहीं, महिला का कहना है कि वह न्याय के लिए इस केस को आगे भी लेकर जाएगी।


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