– अनमोल वैभव: माथे से लेकर चरणों तक कुंदन, हीरे और सोने के आभूषणों से लदी माँ पार्वती की प्रतिमा; आभूषणों की कीमत करोड़ों में।
– विशेष सुरक्षा: हाई सिक्योरिटी जोन में तब्दील होता है दरबार; सीसीटीवी और पुलिस के कड़े पहरे में महज 2 दिन के लिए होते हैं दर्शन।
– पुत्र प्राप्ति की मान्यता: उदयमल को माँ की कृपा से मिला था 'चांदमल' नाम का पुत्र; तभी से मन्नत पूरी होने पर गहने चढ़ाने की है परंपरा।
– अनूठी विशेषता: बीकानेर की एकमात्र गणगौर प्रतिमा जिनके 'पाँव' (चरण) बने हुए हैं; देश-विदेश से पहुँचते हैं श्रद्धालु।
बीकानेर, 21 मार्च (शनिवार)। मरुधरा की सांस्कृतिक राजधानी बीकानेर में चैत्र नवरात्रि के दौरान गणगौर उत्सव का उल्लास चरम पर है। इस उत्सव का सबसे आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है 'चांदमल की गणगौर' का दरबार। यह महज एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बीकानेर के राजसी वैभव और लोक-मान्यता का जीवंत प्रमाण है।
करोड़ों का श्रृंगार और हाई-टेक सुरक्षा
करीब 150 साल पुरानी माँ पार्वती के स्वरूप वाली इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता उनका श्रृंगार है। भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर माँ को सोने, हीरे और कुंदन के आभूषण भेंट करते हैं। दशकों से चली आ रही इस परंपरा के कारण आज माँ के पास करोड़ों रुपये के आभूषणों का खजाना है।
- सुरक्षा चक्र: इतनी बेशकीमती संपत्ति और जनसमूह की सुरक्षा के लिए पूरे पांडाल को किले में तब्दील कर दिया जाता है। हथियारबंद जवानों की तैनाती और हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जाती है।
इतिहास: कैसे पड़ा 'चांदमल की गणगौर' नाम?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 150 वर्ष पूर्व उदयमल नामक व्यक्ति संतान सुख से वंचित थे। उस दौर में गणगौर की पूजा केवल राजघरानों तक सीमित थी, लेकिन उदयमल ने अटूट श्रद्धा से माँ गौरी की आराधना की। ठीक एक वर्ष बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने 'चांदमल' रखा। खुशी में उदयमल ने माँ को उस समय लाखों रुपये के जेवर अर्पित किए। तभी से इस प्रतिमा को 'चांदमल की गणगौर' कहा जाने लगा और यह परंपरा आमजन के लिए खुल गई।
पुत्र रत्न और दीर्घायु की कामना का नृत्य
गणगौर के दौरान तीज और चौथ के दिन यहाँ विशेष मेला भरता है। यह माँ गणगौर की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है जिसमें स्पष्ट रूप से 'पाँव' बने हुए हैं। महिलाएं पुत्र प्राप्ति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए माँ के सामने लोकगीतों पर नृत्य करती हैं। जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं, वे माँ को चुनरी ओढ़ाती हैं और अपने बच्चों को माँ के चरणों में 'धोक' दिलवाने लाती हैं ताकि उनकी आयु लंबी हो।
आस्था का वैश्विक केंद्र
साल में केवल दो दिन के लिए सजने वाले इस दरबार के दर्शन के लिए बीकानेर ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार से भी लोग यहाँ खिंचे चले आते हैं। नारियल और बताशे का प्रसाद चढ़ाकर भक्त अपनी मंगलकामना करते हैं।

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