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अलविदा 'सुरों की मलिका': मशहूर सिंगर आशा भोसले का निधन; ब्रीच कैंडी अस्पताल में ली अंतिम सांस, संगीत के एक सुनहरे युग का अंत

India-1stNews



– शोक में डूबा देश: कार्डियक अरेस्ट के बाद मुंबई के अस्पताल में भर्ती थीं आशा ताई; 9 दशकों तक अपनी आवाज से दुनिया को बनाया दीवाना।

– संघर्ष से शिखर तक: बड़ी बहन लता मंगेशकर के 'सूरज' जैसी चमक के बीच अपनी अलग लौ जलाने वाली 'ज़िद्दी' कलाकार थीं आशा।

– हर दौर की आवाज: 'नया दौर' की सादगी से लेकर 'रंगीला' की शोखी तक; पीढ़ियां बदलीं, नायिकाएं बदलीं, पर आशा की आवाज हमेशा जवान रही।

मुंबई/बीकानेर, 12 अप्रैल (रविवार)। संगीत जगत से आज एक ऐसी दुखद खबर सामने आई है जिसने करोड़ों दिलों की धड़कनें रोक दी हैं। भारतीय संगीत की सबसे वर्सेटाइल और दिग्गज गायिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल के चिकित्सकों ने रविवार को उनके निधन की पुष्टि की है। शनिवार को कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उन्होंने आखिरी सांस ली।

वह आवाज जो हवाओं में हमेशा ठहरी रहेगी

​आशा भोसले महज एक गायिका नहीं, बल्कि एक अहसास थीं। उनकी आवाज में वो जादू था जो शास्त्रीय संगीत की गंभीरता और पॉप संगीत की चुलबुलाहट, दोनों को बखूबी समेटे हुए था। 'उमराव जान' की गजलें हों या 'तीसरी मंज़िल' के कैबरे गीत, 'इजाज़त' का खालीपन हो या 'हरे रामा हरे कृष्णा' का जोश—आशा जी ने हर इमोशन को स्वर दिए।

बड़ी बहन के साये से निकलकर बनाया अपना आसमां

​आशा जी का संघर्ष किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उस दौर में अपनी पहचान बनाना नामुमकिन सा था, जब उनकी अपनी बड़ी बहन और सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर नंबर एक के पायदान पर काबिज थीं। लता नाम के उस 'सूरज' की चमक के आगे अक्सर प्रतिभाएं फीकी पड़ जाती थीं, लेकिन आशा जी की अपनी ज़िद थी। उन्होंने 'नंबर दो' कहलाना स्वीकार किया, लेकिन अपनी मेहनत से उस साये से बाहर निकलकर संगीत के क्षितिज पर अपना एक मुकम्मल आसमां बनाया।

9 साल की उम्र में उठा था पिता का साया

​सुरों का सफर बचपन में ही पिता दीनानाथ मंगेशकर के सानिध्य में शुरू हो गया था। लेकिन जब आशा मात्र 9 साल की थीं, तब पिता का साया सिर से उठ गया। 1945 में जब परिवार मुंबई आया, तो 14 साल की लता के साथ नन्हीं आशा भी परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए संघर्ष के मैदान में उतर गईं।

पीढ़ियां बदलीं, पर आवाज रही जवान

​संगीत की दुनिया में वक़्त बदला, मंज़र बदले और नायिकाएं बदलीं, लेकिन आशा भोसले की आवाज़ कभी बूढ़ी नहीं हुई। उन्होंने हर दौर के संगीतकारों और गायकों के साथ खुद को ढाला। आज भले ही उनका पार्थिव शरीर चला गया हो, लेकिन उनकी आवाज फिजाओं में हमेशा गूंजती रहेगी।

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