— विधिक जीत: एडवोकेट अनिल सोनी ने पहली सुनवाई में ही तहसीलदार और एसडीएम को दिलाया न्याय; आयोग ने माना—'शिकायतकर्ता उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं'।
— तथ्य: आरटीआई में सूचना न मिलने पर एडीएम (प्रशासन) के बजाय नोखा तहसीलदार व एसडीएम के विरुद्ध दायर किया था मुकदमा।
— आदेश: जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष शिवशंकर जांगिड़ ने परिवाद को प्रारंभिक स्तर पर ही किया खारिज; दोहराव वाली कानूनी कार्रवाई को बताया गलत।
बीकानेर, 11 मई (सोमवार)। नोखा तहसीलदार और एसडीएम के खिलाफ आरटीआई (सूचना के अधिकार) के तहत सूचना नहीं देने पर उपभोक्ता आयोग में दायर किया गया मुकदमा परिवादी के लिए उल्टा पड़ गया। जिला उपभोक्ता आयोग बीकानेर के अध्यक्ष शिवशंकर जांगिड़ ने प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई में ही परिवादी फूलाराम बिश्नोई (रिटायर्ड गिरदावर) के परिवाद को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे तहसीलदार और एसडीएम के 'उपभोक्ता' नहीं हैं।
अधिकारियों पर दबाव बनाने का प्रयास
मामले के अनुसार, फूलाराम बिश्नोई ने लोक सूचना अधिकारी (अतिरिक्त जिला कलेक्टर प्रशासन, बीकानेर) के यहाँ दो अलग-अलग आवेदन कर तहसीलदार और एसडीएम नोखा की लॉग बुक आदि की निजी सूचना मांगी थी। सूचना नहीं मिलने पर परिवादी ने राज्य सूचना आयोग जयपुर में द्वितीय अपील दायर कर दी, लेकिन साथ ही जिला उपभोक्ता आयोग में एडीएम के बजाय सीधे तहसीलदार और एसडीएम नोखा के विरुद्ध परिवाद पेश कर जुर्माना लगाने की मांग की।
एडवोकेट अनिल सोनी की प्रभावी पैरवी
तहसीलदार और एसडीएम नोखा की ओर से पैरवी करते हुए एडवोकेट अनिल सोनी ने आयोग के समक्ष कड़ी आपत्ति दर्ज करवाई। उन्होंने तर्क दिया कि:
- परिवादी ने आवेदन और शुल्क (पोस्टल ऑर्डर) एडीएम कार्यालय में जमा करवाया था, इसलिए वह तहसीलदार और एसडीएम का उपभोक्ता नहीं है।
- परिवादी ने केवल अधिकारियों पर अनुचित दबाव बनाने के लिए यह कदम उठाया है।
- मामला पहले से ही राज्य सूचना आयोग में विचाराधीन (Subjudice) है, ऐसे में दो अलग-अलग मंचों पर एक ही विषय के लिए कार्रवाई करना विधि विरुद्ध है।
आयोग का महत्वपूर्ण निर्णय
आयोग ने एडवोकेट अनिल सोनी के तर्कों से सहमत होते हुए कहा कि सूचना के अधिकार के तहत बने अधिनियम में अनुतोष प्राप्त करने के अपने स्पष्ट प्रावधान हैं। एक ही विषयवस्तु पर दो अलग-अलग अधिनियमों के तहत कार्रवाई से आदेशों में विरोधाभास होने का खतरा रहता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि राजकीय निकायों को प्राप्त सम्प्रभु शक्तियों के तहत विचाराधीन कार्यवाहियों में उपभोक्ता आयोग का हस्तक्षेप वर्जित है। इसी आधार पर परिवाद को खारिज कर दिया गया।

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